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शहडोल जिला अस्पताल के चिकित्सक ने तीन वर्षों से 'मिर्गी' का इलाज करा रही महिला में पकड़ी दुर्लभ बीमारी, समय पर निदान से मिली नई जिंदगी


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drms news (शहडोल)कई वर्षों तक मिर्गी (एपिलेप्सी) समझकर इलाज कराने वाली 56 वर्षीय महिला को आखिरकार शहडोल जिला अस्पताल में उसकी वास्तविक बीमारी का पता चल गया। लगातार दौरे, घबराहट, अत्यधिक पसीना, बेहोशी जैसे लक्षणों से परेशान महिला विभिन्न शहरों में महंगे उपचार, एमआरआई, ईईजी तथा अन्य जांचें करा चुकी थी, लेकिन बीमारी का सही कारण सामने नहीं आ पाया था। जिला अस्पताल शहडोल में न्यूरो साइकियाट्रिस्ट एवं नशा मुक्ति विशेषज्ञ डॉ. सुमित दास गुप्ता (एमबीबीएस, एमडी मनोरोग) के पास महिला अनिद्रा, अत्यधिक चिंता, अवसाद और बार-बार दौरे पड़ने के डर की शिकायत लेकर पहुंची।

डॉ. दासगुप्ता ने बताया कि प्रारंभिक जांच में मामला सामान्य मिर्गी जैसा नहीं लगा। मरीज के परिजनों द्वारा दिखाए गए वीडियो में दौरे के दौरान महिला को अत्यधिक पसीना आना, अर्धचेतन अवस्था और कुछ मांसपेशियों में झटके दिखाई दे रहे थे, जबकि सामान्य मिर्गी में पाए जाने वाले कई प्रमुख लक्षण स्पष्ट रूप से अनुपस्थित थे। इससे उन्हें संदेह हुआ कि कहीं समस्या किसी अन्य कारण से तो नहीं हो रही।

पुराने मेडिकल रिकॉर्ड देखने पर लगभग दो वर्ष पूर्व की रिपोर्ट में रक्त शर्करा (ब्लड शुगर) का स्तर असामान्य रूप से कम पाया गया था, जिस पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया था। इसके बाद दोबारा कराई गई जांचों में भी उपवास (फास्टिंग) तथा भोजन के बाद (पोस्टप्रांडियल) दोनों स्थितियों में ब्लड शुगर लगातार कम मिली।

डॉ. दासगुप्ता ने यह भी बताया कि मरीज को जब भी घबराहट, तेज धड़कन, अत्यधिक पसीना, चक्कर और कमजोरी महसूस होती थी, उसी समय ब्लड शुगर गिर जाती थी। इससे उन्हें यह आशंका हुई कि ये दौरे वास्तव में हाइपोग्लाइसीमिया (रक्त शर्करा का अत्यधिक कम होना) के कारण हो सकते हैं, न कि मिर्गी के स्थिति स्पष्ट करने के लिए मरीज को ग्लूकोज दिया गया, लेकिन कुछ ही समय बाद ब्लड शुगर दोबारा काफी कम हो गई। इसके बाद चिकित्सकीय संदेह और मजबूत हुआ तथा आगे की विशेष जांचें कराई गई।

डॉ. दास गुप्ता ने मरीज की सीरम इंसुलिन, सी-पेप्टाइड, प्रोइंसुलिन सहित अन्य आवश्यक जांचें तथा पेट की सीईसीटी (CECT Abdomen) कराने की सलाह दी। जांच रिपोर्ट में इंसुलिन और सी- पेप्टाइड का स्तर बढ़ा हुआ मिला तथा सीईसीटी में अग्न्याशय (पैंक्रियास) के आसपास लगभग 18×17 मिमी का ट्यूमरनुमा घाव दिखाई दिया। रेडियोलॉजी रिपोर्ट में भी लगातार हाइपोग्लाइसीमिया के साथ मिलान करते हुए इंसुलिनोमा (Insulinoma) की संभावना व्यक्त की गई। इसके बाद मरीज को इंसुलिनोमा की जानकारी दी गई तथा बताया गया कि यह एक दुर्लभ लेकिन उपचार योग्य स्थिति है। चिकित्सकीय मूल्यांकन में ट्यूमर के दूर तक फैलने (मेटास्टेसिस) के संकेत नहीं मिले।

रोग की सही पहचान होने के बाद अनावश्यक एंटी-एपिलेप्टिक दवाओं में चिकित्सकीय विवेक के अनुसार कमी की गई। मरीज को हाइपोग्लाइसीमिया के शुरुआती लक्षण पहचानने, हमेशा ग्लूकोज या ग्लूकोज टैबलेट साथ रखने की सलाह दी गई। साथ ही उसकी अनिद्रा और अवसाद के लिए भी उपचार प्रारंभ किया गया। कुछ समय के फॉलो-अप के दौरान मरीज को पहले की तरह दौरे नहीं आए तथा उसकी मानसिक स्थिति और दैनिक जीवन में उल्लेखनीय सुधार देखा गया।

पति ने जताया आभार

मरीज के पति मनोज ने भावुक होकर बताया कि पिछले लगभग तीन वर्षों में वे नागपुर, भोपाल, रायपुर सहित कई शहरों में उपचार कराते रहे। अनेक महंगी जांचों और इलाज के बावजूद बीमारी का सही कारण सामने नहीं आया। उन्होंने कहा कि शहडोल जिला अस्पताल में सही दिशा में जांच होने से उनकी पत्नी को वास्तविक बीमारी का पता चला और अब उन्हें भविष्य के प्रति नई उम्मीद मिली है।

डॉ. सुमित दास गुप्ता ने जानकारी देते हुए कहा कि "हर दौरा मिर्गी नहीं होता। यदि मरीज में बार-बार ब्लड शुगर कम हो रही हो, अत्यधिक पसीना, घबराहट, धड़कन तेज होना और बेहोशी जैसे लक्षण हों, तो केवल मिर्गी मानकर उपचार करने के बजाय अन्य संभावित कारणों की भी व्यवस्थित जांच आवश्यक है। समय पर सही निदान से मरीज को अनावश्यक उपचार और मानसिक पीड़ा से बचाया जा सकता है।" उन्होंने कहा कि छोटे शहरों के सरकारी अस्पतालों में भी यदि विस्तृत इतिहास, सावधानीपूर्वक परीक्षण और तार्किक चिकित्सकीय दृष्टिकोण अपना जाए तो जटिल और दुर्लभ बीमारियों का सफलतापूर्वक निदान किया जा सकता है।

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