
drms news(ब्रजधर समाचार(शहडोल)। शहडोल संभाग के उमरिया जिले के बिरसिंहपुर पाली में विराजित मां बिरासिनी देवी का मंदिर क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरों में विशेष स्थान रखता है। मां बिरासिनी को मां काली एवं आदिशक्ति के स्वरूप में पूजा जाता है। मंदिर में विराजित प्राचीन प्रतिमा, उससे जुड़ी लोकमान्यताएं और नवरात्र के दौरान होने वाले धार्मिक अनुष्ठान इस धाम को श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बनाते हैं।
मां बिरासिनी मंदिर की स्थापना से जुड़ी एक प्रचलित लोककथा के अनुसार, सैकड़ों वर्ष पहले पाली निवासी धौकल नामक व्यक्ति को माता ने स्वप्न में दर्शन दिए थे। मान्यता है कि माता ने उन्हें बताया कि उनकी प्रतिमा एक खेत में है और उसे निकालकर उचित स्थान पर स्थापित किया जाए। इसके बाद धौकल ने संबंधित स्थान पर खुदाई कराई, जहां से माता की प्रतिमा प्राप्त होने की बात कही जाती है। उन्होंने प्रतिमा को एक छोटी-सी मढ़िया में स्थापित कर पूजा-अर्चना प्रारंभ की।
समय के साथ माता के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था बढ़ती गई। स्थानीय मान्यता के अनुसार, बाद में नगर के राजा बीरसिंह ने यहां मंदिर का निर्माण करवाया। इस प्रकार एक छोटे पूजा स्थल से विकसित होकर यह मंदिर क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल हो गया। यह विवरण लोकपरंपरा और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है।
कल्चुरी कालीन मानी जाती है मां बिरासिनी की प्रतिमा
मंदिर में स्थापित मां बिरासिनी की प्रतिमा को इतिहासकारों एवं स्थानीय जानकारों के हवाले से कल्चुरी काल की माना जाता है। विभिन्न प्रकाशित विवरणों में इसका काल लगभग दसवीं शताब्दी बताया गया है। काले पत्थर से निर्मित माता की प्रतिमा अपने विशिष्ट स्वरूप के लिए जानी जाती है।
प्रतिमा की एक विशेषता यह बताई जाती है कि मां काली के स्वरूप में होने के बावजूद माता की जीभ बाहर निकली हुई नहीं है। मंदिर के गर्भगृह में माता के समीप भगवान हरिहर की प्रतिमा भी विराजमान है। भगवान हरिहर को भगवान शिव और भगवान विष्णु के संयुक्त स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। मंदिर परिसर में अन्य देवी-देवताओं के भी पूजा स्थल हैं।
वर्ष 1989 में शुरू हुआ मंदिर का जीर्णोद्धार
समय के साथ प्राचीन मंदिर को भव्य स्वरूप प्रदान करने के उद्देश्य से इसके जीर्णोद्धार का कार्य प्रारंभ किया गया। उपलब्ध प्रकाशित विवरणों के अनुसार, 23 नवंबर 1989 को जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के मार्गदर्शन एवं सान्निध्य में जीर्णोद्धार कार्य की शुरुआत हुई थी।
स्थानीय नागरिकों, कोयला क्षेत्र के प्रबंधन तथा दानदाताओं के सहयोग से लगभग 27 लाख रुपये की लागत से मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया। मंदिर का वास्तुचित्र वास्तुकार विनायक हरिदास, एनबीसीसी नई दिल्ली द्वारा उपलब्ध कराया गया था। इसके बाद 22 अप्रैल 1999 को जगद्गुरु शंकराचार्य पुरी पीठ के स्वामी निश्चलानंद सरस्वती के सान्निध्य में मंदिर के लोकार्पण एवं प्रतिष्ठा संबंधी कार्यक्रम संपन्न होने का उल्लेख मिलता है।
नवरात्र में विशेष पूजा, ज्योति कलश और जवारा कलश की स्थापना
मां बिरासिनी मंदिर में चैत्र और शारदीय नवरात्र का विशेष धार्मिक महत्व है। इन अवसरों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन करने पहुंचते हैं। मंदिर में विधि-विधान से पूजा-अर्चना, आरती, विशेष श्रृंगार तथा ज्योति कलश और जवारा कलश की स्थापना की जाती है।
महाष्टमी के अवसर पर अठवाईं अर्पित करने की भी परंपरा प्रचलित है। श्रद्धालु माता के चरणों में पूजा सामग्री अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना करते हैं। नवरात्र के दौरान मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण रहता है और दूर-दराज के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
धार्मिक आस्था के साथ ऐतिहासिक धरोहर भी है मंदिर
बिरसिंहपुर पाली का मां बिरासिनी मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल ही नहीं, बल्कि क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्राचीन प्रतिमा, उससे जुड़ी लोककथा, मंदिर के जीर्णोद्धार का इतिहास और पीढ़ियों से चली आ रही पूजा परंपराएं इस धाम की विशिष्ट पहचान हैं।
उमरिया जिले की पहचान से जुड़े इस प्राचीन देवी धाम में श्रद्धालु मां बिरासिनी के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं। आस्था और परंपरा से जुड़ा यह मंदिर आज भी क्षेत्र के धार्मिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
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