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drms news/ब्रजधर समाचार (मानपुर उमरिया)। नवदुर्गा के बाद दशहरा आ गया, रावण भी जल जाएगा, मिठाइयां भी बंटेंगी और घर-घर त्योहार की खुशियां भी मनेंगी, लेकिन नगर परिषद मानपुर के आउटसोर्स कर्मचारियों और सफाई कर्मियों के घर इस बार त्योहार से ज्यादा वेतन का इंतजार है। इनका दो माह से वेतन अटका है और जेब ऐसी खाली कि त्योहार की खुशी भी शायद उधार मांगनी पड़ रही है।
आप विडंबना देखिए जो कर्मचारी पूरे शहर की गंदगी उठाकर शहर को त्योहार के लिए चमकाते रहे, उनके अपने घर की रसोई ही आर्थिक तंगी की धुंध में है।
जानकारी के मुताबिक नगर परिषद में करीब 40 सफाई कर्मियों को 26 दिन की मजदूरी के बदले लगभग 10 हजार रुपए प्रतिमाह मिलते हैं। कार्यालयीन आउटसोर्स कर्मचारियों को करीब 12 हजार 800 रुपए प्रतिमाह भुगतान किया जाता है। इतनी कम आय में घर चलाना पहले ही किसी परीक्षा से कम नहीं, ऊपर से दो माह का वेतन अटक जाए तो समझिए महंगाई ने एक तरफ से और व्यवस्था ने दूसरी तरफ से घेर लिया।
रावण के दस सिर गिनना आसान, वेतन की फाइल का सिरा ढूंढना मुश्किल ... ?
दशहरा पर बुराई के दस सिर वाले रावण का पुतला जलाया जाएगा। लेकिन नगर परिषद के कर्मचारियों के सामने सवाल यह है कि उनकी आर्थिक परेशानी का रावण कब जलेगा .. ?क्या दो माह से लंबित वेतन की फाइल इतनी भारी है कि जिम्मेदारों की मेज से आगे बढ़ ही नहीं पा रही ...? क्या गरीब कर्मचारी की मजदूरी का भुगतान त्योहार की तैयारियों से भी कम जरूरी है ... ?
शहर साफ, व्यवस्था की तस्वीर धुंधली
सफाई कर्मचारी त्योहारों के दौरान भी अपनी ड्यूटी निभाते हैं। उन्हें यह सुविधा नहीं कि त्योहार है तो काम बंद कर दें। शहर की सड़कें, बाजार और गलियां साफ रखने की जिम्मेदारी इन्हीं कर्मचारियों के कंधों पर रहती है, लेकिन सवाल यह है कि इन कर्मचारियों के घर की सफाई आर्थिक तंगी से कौन करेगा ... ?
दो माह की मजदूरी नहीं मिलने पर परिवार का राशन, बच्चों की जरूरतें, त्योहार का खर्च और रोजमर्रा की जिंदगी कैसे चलेगी, इसका हिसाब शायद उन लोगों की डायरी में नहीं लिखा जाता, जिन्हें हर महीने समय पर वेतन मिल जाता है।
अध्यक्ष-सीएमओ का तालमेल, भुगत रहा कर्मचारी
नगर परिषद में अध्यक्ष और नवागत सीएमओ के बीच समन्वय को लेकर चर्चाएं हैं। यदि वास्तव में प्रशासनिक तालमेल की कमी है तो सवाल सीधा है, कुर्सियों के बीच की दूरी का हिसाब कर्मचारी की जेब से क्यों चुकाया जा रहा है ... ?
व्यवस्था में कमी किस स्तर पर है, यह जिम्मेदार बेहतर बता सकते हैं। लेकिन इतना जरूर है कि कर्मचारी ने काम किया है तो उसकी मजदूरी रोकना किसी भी प्रशासनिक उलझन का समाधान नहीं हो सकता।
त्योहार सबका है, फिर गरीब कर्मचारी की थाली ही क्यों सूनी... ?
दशहरा अच्छाई की जीत का पर्व है। ऐसे में नगर परिषद के जिम्मेदारों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या गरीब कर्मचारी को उसकी मेहनत की कमाई समय पर दिलाना भी व्यवस्था की प्राथमिकता में शामिल है ... ? शहर को स्वच्छ रखने वाले इन कर्मचारियों की मांग कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं है। वे अपनी मेहनत की दो माह की कमाई मांग रहे हैं।
अब जरूरत है कि नगर परिषद प्रबंधन त्योहार की औपचारिकताओं से आगे बढ़ कर कर्मचारियों की वास्तविक परेशानी देखे, लंबित वेतन का तत्काल भुगतान करे और ऐसी व्यवस्था बनाए कि अगली बार दशहरा आए तो कर्मचारी वेतन के इंतजार में नहीं, अपने परिवार के साथ त्योहार मनाते नजर आएं। (सूचनादाता एवं संकलनकर्ता- समाजसेवी मनोज श्रीवास्तव, केशव विश्वकर्मा मानपुर)
संपादक वीरेन्द्र प्रताप सिंह कृपया http://www.drmsnews.in वेबसाइट को शेयर, लाईक व लाइव जरूर करें और विज्ञापन व समाचारों के लिए संपर्क करें। 8962637936, 8085090333 आपका सहयोग हमारे लिए अमूल्य है, बहुत बहुत धन्यवाद आभार। डिस्क्लेमर : यहां पर दिया गया प्रसारित व प्रकाशित विज्ञापन/समाचार, हमें विभिन्न सूत्रों से मिली जानकारी पर आधारित है, जिसे केवल सूचना के लिए दी जा रही है drms news व संपादक इसकी पुष्टि नही करता और ना ही जिम्मेदार है।
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