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drms news (अनूपपुर)। जिला चिकित्सालय अनूपपुर में डायलिसिस मशीन पिछले करीब एक सप्ताह से खराब होने के कारण किडनी रोगियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
नियमित डायलिसिस पर निर्भर मरीजों के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। मशीन बंद होने से मरीजों और उनके परिजनों को निजी अस्पतालों अथवा अन्य स्थानों पर डायलिसिस कराने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, जिससे आर्थिक बोझ के साथ-साथ मानसिक परेशानी भी बढ़ रही है।
मरीजों के परिजनों का कहना है कि मशीन खराब हुए कई दिन बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक उसे दुरुस्त नहीं कराया जा सका है। गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए डायलिसिस समय पर होना जीवनरक्षक आवश्यकता है। ऐसे में जिला अस्पताल जैसी महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संस्था में यह सुविधा लंबे समय तक बाधित रहना व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
छह दिन में मशीन की बीमारी दूर नहीं, मरीजों की बीमारी कैसे होगी दूर ...?
डायलिसिस मशीन जैसी महत्वपूर्ण चिकित्सा सुविधा के लगातार बंद रहने को लेकर अस्पताल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। मरीजों और उनके परिजनों का कहना है कि जब छह-सात दिन में एक खराब मशीन को ठीक नहीं कराया जा सका, तो गंभीर मरीजों को समय पर बेहतर उपचार और आवश्यक सुविधाएं कैसे मिल पाएंगी।
जिला चिकित्सालय के सिविल सर्जन डॉ. परस्ते की कार्यप्रणाली को लेकर भी मरीजों के परिजनों में नाराजगी है। उनका कहना है कि इतने गंभीर विषय पर तत्काल पहल और वैकल्पिक व्यवस्था की आवश्यकता थी।।
छह दिन बाद भी मशीन की ‘बीमारी’ दूर नहीं, मरीजों की बीमारी कैसे होगी दूर ...?
डायलिसिस मशीन जैसी महत्वपूर्ण जीवन रक्षक सुविधा का लंबे समय तक बंद रहना अस्पताल की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। मरीजों और उनके परिजनों में यह सवाल उठ रहा है कि जब छह-सात दिन में अस्पताल प्रशासन एक खराब मशीन को ठीक नहीं करा पा रहा है, तो गंभीर मरीजों को समय पर बेहतर उपचार और आवश्यक सुविधाएं कैसे उपलब्ध कराई जाएंगी?वहीं, जिला चिकित्सालय के सिविल सर्जन डॉ. परस्ते की कार्यप्रणाली को लेकर भी मरीजों के परिजनों में नाराजगी देखने को मिल रही है। आरोप है कि इतनी महत्वपूर्ण चिकित्सा सुविधा बाधित होने के बावजूद समस्या के तत्काल समाधान को लेकर अपेक्षित गंभीरता नजर नहीं आ रही है।
मरीजों की जिंदगी से जुड़ा मामला, तत्काल हस्तक्षेप की मांग
किडनी रोगियों के लिए डायलिसिस महज एक सामान्य चिकित्सा सुविधा नहीं, बल्कि जीवन से जुड़ी आवश्यकता है। ऐसे में प्रशासन को मामले को संवेदनशीलता से लेते हुए खराब मशीन को तत्काल दुरुस्त कराने अथवा वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
महीने में दो-तीन बार खराब होती है डायलिसिस यूनिट, फिर भी नहीं चेता प्रबंधन
डायलिसिस यूनिट की मौजूदा खराबी को लेकर मरीजों और उनके परिजनों में नाराजगी इसलिए भी है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। बताया जा रहा है कि डायलिसिस यूनिट महीने में दो-तीन बार तकनीकी खराबी का शिकार हो जाती है। बार-बार सामने आ रही इस समस्या के बावजूद जिला अस्पताल प्रबंधन द्वारा इसके स्थायी समाधान के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए जाने पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
मरीजों के लिए डायलिसिस समय पर मिलना बेहद जरूरी है। ऐसे में यूनिट का बार-बार बंद होना केवल अस्पताल की तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि उन मरीजों की जिंदगी और स्वास्थ्य से जुड़ा विषय है जो नियमित डायलिसिस पर निर्भर हैं। सवाल उठता है कि जब यूनिट में बार-बार खराबी सामने आ रही है तो इसकी तकनीकी जांच, नियमित मेंटेनेंस और वैकल्पिक व्यवस्था की स्थायी योजना क्यों नहीं बनाई गई?
नया भवन तैयार, फिर भी डायलिसिस यूनिट की शिफ्टिंग का इंतजार
एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जिला अस्पताल परिसर में डायलिसिस यूनिट के लिए नया भवन मे तैयार किया जा चुका है। बताया जा रहा है कि भवन को आवश्यक सुविधाओं के अनुरूप तैयार कर डायलिसिस यूनिट संचालित करने की व्यवस्था बनाई गई है, इसके बावजूद यूनिट को नए भवन में शिफ्ट नहीं किया जा रहा है।
मरीजों और उनके परिजनों का सवाल है कि जब नई व्यवस्था तैयार है तो आखिर डायलिसिस यूनिट को वहां स्थानांतरित करने में देरी क्यों हो रही है? यदि नए भवन में बेहतर विद्युत व्यवस्था, पानी, आवश्यक तकनीकी सुविधाएं, पर्याप्त स्थान, तापमान नियंत्रण और उपकरणों के रखरखाव की समुचित व्यवस्था उपलब्ध है, तो वहां यूनिट को शिफ्ट करने से मौजूदा समस्याओं को कम करने और डायलिसिस सेवा को अधिक व्यवस्थित बनाने में मदद मिल सकती है।।
“बार-बार मरम्मत या स्थायी समाधान जांच का विषय”
डायलिसिस मशीन के बार-बार खराब होने को लेकर अब एक और गंभीर सवाल उठ रहा है। यदि यूनिट महीने में दो-तीन बार खराब होती है और हर बार इसकी मरम्मत पर सरकारी राशि खर्च होती है, तो पिछले वर्षों में हुए मरम्मत खर्च और भुगतान की जांच क्यों न कराई जाए ...? मरीजों और उनके परिजनों का कहना है कि यदि मशीन का स्थायी तकनीकी समाधान संभव है तो बार-बार अस्थायी मरम्मत क्यों . ..?
हालांकि, लेकिन लगातार होने वाली खराबियों और मरम्मत खर्च के बीच संबंध की जांच आवश्यक है। यदि रिकॉर्ड में बार-बार एक ही प्रकार की खराबी, बार-बार एक ही एजेंसी को भुगतान या अनावश्यक मरम्मत खर्च सामने आता है, तो मामला गंभीर हो सकता है।
ऐसे में जिला प्रशासन को चाहिए कि वह डायलिसिस यूनिट की पिछले एक-दो वर्षों की मरम्मत, मेंटेनेंस और भुगतान संबंधी पूरी फाइल की जांच कराए। साथ ही नए भवन में यूनिट शिफ्ट करने में हो रही देरी के कारणों की भी पड़ताल की जाए। मरीजों का सवाल सीधा - मरीजों को निर्बाध डायलिसिस चाहिए, बार-बार की मरम्मत और व्यवस्था की परेशानी नहीं।
कलेक्टर ने कहा“ मैं इसको दिखवाता हूं”
मामले को लेकर जब अनूपपुर कलेक्टर रत्नाकर झा से जानकारी ली गई तो उन्होंने संक्षिप्त प्रतिक्रिया देते हुए कहा “मैं इसको दिखवाता हूं।”
कलेक्टर की इस प्रतिक्रिया के बाद अब उम्मीद है कि जिला अस्पताल में बंद पड़ी डायलिसिस सुविधा को लेकर तत्काल पहल होगी और मरीजों को राहत मिलेगी।
मरीजों की जिंदगी से जुड़ा मामला, तत्काल समाधान जरूरी
किडनी रोगियों के लिए डायलिसिस कोई सामान्य सुविधा नहीं, बल्कि जीवन से जुड़ी आवश्यकता है। ऐसे में जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को मामले को संवेदनशीलता से लेते हुए मशीन को तत्काल दुरुस्त कराने अथवा वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध कराने की जरूरत है।
मरीजों और उनके परिजनों ने मांग की है कि डायलिसिस मशीन जल्द से जल्द चालू कराई जाए, ताकि गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को इलाज के लिए दर-दर भटकने और अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाने से राहत मिल सके। अब देखना होगा कि कलेक्टर के संज्ञान में आने के बाद जिला चिकित्सालय की डायलिसिस व्यवस्था कितनी जल्दी पटरी पर लौटती है।
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