भारतीय साहित्य मानवता व लोक कल्याण की यात्रा का प्रतिबिम्ब - प्रो. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी (कुलपति)
संपादक वीरेन्द्र प्रताप सिंह DRMS NEWS 8962637936
DRMS NEWS अमरकंटक। प्रत्येक मनुष्य में संवेदनाएं होती है, और संवेदनाएं ही कविता, कहानियों तथा लेखो के माध्यम से साहित्यकारों के साहित्य में सृजित होती है, अतः यह कहा जा सकता है कि इस धरती का प्रत्येक मनुष्य साहित्यकार होता है।
हमारी साहित्यिक ज्ञानधारा समझ, संस्कृति और संस्कार के रूप में वर्णित है। यह व्यवस्था और परिवेश का विवरण देने वाला होता है। वेद तथा अन्य वैदिक साहित्य जिसमें वेदसंहिता, ब्राह्मण-ग्रन्थ, आरण्यक एवं उपनिषद् इत्यादि में विस्तृत ज्ञान विज्ञान अनुभव का व्यापक दृष्टान्त भरा पड़ा है।
वस्तुतः वेद अपौरुषेय होते है, इसको हमारे ऋषियों ने ध्यान बोध में रखा। हमारे प्राचीन भारतीय साहित्य में श्रुति परम्परा भी व्याप्त थी, क्योंकि परमब्रह्म की वेदध्वनि को सुनकर ही ज्ञान प्राप्त किया गया था तथा कालांतर में अन्य ऋषियों एवं महर्षियों ने भी इस साहित्य को श्रवण-परम्परा से ही ग्रहण कर आगे की पीढ़ियों में भी ये श्रवण परम्परा द्वारा ही ज्ञान स्थान्तरित किये।
इस परम्परा को श्रुति परम्परा भी कहा जाता है तथा साहित्य सृजन श्रुति परम्परा पर आधारित होने के कारण श्रुति साहित्य कहलाया। किसी काल खण्ड में हमारे यहाँ के मानिंद पुस्तकालयों को आक्रान्ताओं ने जब विनष्ट कर दिया था, उस समय के साहित्यकारों ने श्रुति परम्परा के सहारे साहित्य सृजन का कार्य किया।
वस्तुतः साहित्य के तीन गुण अत्यधिक ध्यान योग्य है; निरंतरता, सामयिकता तथा परिवर्तनशीलता। वास्तव में साहित्यकार के माध्यम से साहित्य निरंतर प्रवाहमान होता है, साथ ही साथ साहित्य सामयिक व्यवस्था, सामाजिकता तथा विधानों को भी प्रकाश में लाने का कार्य करता है।
इसी प्रकार प्रत्येक युग का अपना एक युग धर्म होता है जो साहित्य के माध्यम से अभिव्यक्त होता है। उक्त बाते इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक के अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, महाकौशल प्रान्त अनूपपुर इकाई के तत्वावधान में “भारत की साहित्यिक परम्परा और लोक दृष्टि”. विषयक साहित्यिक विमर्श कार्यक्रम में उद्बोधन देते हुए बतौर अध्यक्ष इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अमरकंटक के माननीय कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी ने कही।
आगे उन्होंने यह भी कहा की साहित्य में रस, छन्द और अलंकार भी होते है तथा साहित्य व्याकरण से आबद्ध भी होता है। व्याकरण हमें सदैव मर्यादित रहना सीखाता है, चाहे साहित्यिक मर्यादा का विषय हो या वैयक्तिक, सामाजिक और सामूहिक मर्यादा का हो। वस्तुतः साहित्य की मर्यादा लोक हित के लिए होती है इसीलिए कहा गया है, सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय।
आज हिन्दी विश्व भाषा है, रोजगार की भाषा है, ज्ञान की भाषा है और विज्ञान की भाषा है। हिन्दी प्रिंट मीडिया तथा शोसल मीडिया ने साहित्यिक रचनाओं का विस्तार किया है। साहित्य में साहित्यकार की दृष्टि सदैव सम्यक होती है और चिंतन पर केन्द्रित होती है, जिससे साहित्यकार लोक मानस, लोक हित और लोक मंगल की भावना से ओतप्रोत होकर साहित्य का सृजन करता है।
यह भी सत्य है की साहित्य समाज का दर्पण होता है। दर्पण का स्वाभाव होता है, जो होता है वही दिखता है। यह दर्पण तीन तरह का होता है प्रथम स्व का दर्पण, मन का दर्पण और ध्यान का दर्पण। साहित्य व्यष्टि से समष्टि और समष्टि से दिग्दृष्टि का दर्शन कराता है।
हमारा साहित्य सर्वोन्नत का भाव रखता है , सर्वोन्नत की मार्ग लोक मंगल और लोक कल्याण से है। साहित्यकार की सामर्थ्य है कि ईश्वर क्या है, कैसा है, कौन है, इन सभी प्रश्नों का समाधान अपने चिंतन धारा से उपजे ज्ञान साहित्य को सृजित करके लोक में लाने का कार्य करता है अतः साहित्यकार सबसे बड़ा सृष्टा कहलाता है। यह सृजनशीलता दो रूपों में अभिव्यक्त होती है प्रथम सत्य की धारा से और दूसरा अहिंसा की धारा से।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि श्रीमती शीला त्रिपाठी, अध्यक्ष श्री शील मंडल, माननीय कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी, प्रो. प्रबुद्ध मिश्रा, डॉ. विजय नाथ मिश्रा सहित अन्य विद्वानो के साथ विद्या की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती के चित्र पर पुष्पार्चन, माल्यार्पण व दीपप्रज्ज्वलन कर कार्यक्रम की विधिवत शुरुआत की।
कार्यक्रम की प्रस्ताविकी दर्शनशास्त्र विभाग के सहायक आचार्य तथा अखिल भारतीय साहित्य परिषद् शहडोल संभाग के अध्यक्ष *डॉ. राकेश सोनी* ने प्रस्तुत करते हुए कहा की इस साहित्य परिषद् का उददेश्य भारत की ज्ञान परम्परा और साहित्यिक धारा को वैश्विक फलक पर प्रकाश में लाना है।
वास्तव में सनातन साहित्य परम्परा में तीन तत्व प्रधान है, प्रथम शब्द परम्परा, निशब्द परम्परा और लौकिक व लोकायत परम्परा। इन्ही परम्पराओं से उपजे ज्ञान ने साहित्य के सर्जनात्मकता को केंद्र में लाया। वेद, पुराण, ज्योतिष, आयुर्वेद, धर्मशास्त्र इत्यादि ज्ञान विज्ञानं और साहित्य के मुख्य रूप है। भारत मुनि के नाट्य शास्त्र में रस का विवेचन किया गया है जिसे ब्रम्ह रस कहते है, जिससे कालांतर में कला और साहित्य के अनेक सिद्धान्त गढ़े गये। आचार्य क्षेमेन्द्र, कुंतक इत्यादि आचार्यों ने रसों के संयोजन और विभक्ति के महत्व को समझाया है। वही आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने रस को लोक मंगल की भावना से जोड़ा, तथा यह बताया की रस का अर्थ जीवन बोध है।
इस अवसर पर अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, अनूपपुर इकाई का गठन किया गया जिसके संरक्षक माननीय कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी जी है, जबकि अध्यक्ष - डॉ. ऋषि पालीवाल, उपाध्यक्ष –डॉ. पूनम पाण्डेय एवं डॉ. डी. पी. शर्मा, महामंत्री – डॉ. कृष्ण मुरारी सिंह, संयुक्त मंत्री – डॉ. कुञ्ज बिहारी सुलाखिया, मंत्री – डॉ. सुनीता मिंज, कोषाध्यक्ष - डॉ. शिखा बनर्जी, प्रचार प्रमुख – डॉ. डी. एन. चौबे , सदस्य – डॉ. राजनारायण ओझा, डॉ. रेनू सिंह, डॉ. जया भट्ट, डॉ. त्र्यम्बक नाथ पाण्डेय, डॉ. जितेन्द्र सिंह इत्यादि वही डॉ. बी. एन. मिश्रा तथा डॉ. मृदुल सिंह विशेष आमंत्रित सदस्य की भूमिका में होंगे।
कार्यक्रम का संचालन हिन्दी विभाग की सहायक आचार्य डॉ. पूनम पाण्डेय ने किया तथा अखिल भारतीय साहित्य परिषद् अनूपपुर इकाई के नवनियुक्त अध्यक्ष डॉ. ऋषि पालीवाल ने आभार ज्ञापन किया। इस अवसर पर प्रमुख विद्वानों में प्रो. प्रबुद्ध मिश्रा, विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी डॉ. विजय नाथ मिश्रा, डॉ. मनोज पाण्डेय. डॉ. सुनीता मिंज, डॉ. शिखा बनर्जी, डॉ. जितेन्द्र सिंह, डॉ. त्र्यम्बक नाथ पाण्डेय, डॉ. मृदुल सिंह, डॉ. दिग्विजय चौबे, डॉ. पंकज त्रिपाठी, डॉ. सौरभ मिश्र, डॉ. विनय तिवारी, डॉ. कृष्ण मुरारी सिंह, डॉ. सचिन द्विवेदी, डॉ. सपना श्रीवास्तव, डॉ. जया शर्मा, डॉ. अमृता सिंह, डॉ. कीर्ति, डॉ. वाशु चौधरी, श्रीमती जाग्रति सोनी, डॉ. कुञ्ज बिहारी सहित अन्य शिक्षक शिक्षिकाएं उपस्थित रहे।
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