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drms news (मानपुर उमरिया)। वर्ष 2018 में नाबार्ड के वित्तपोषण से लगभग 42.04 करोड़ रुपये की लागत से शुरू की गई बल्हौड बहु-ग्रामीण जल प्रदाय योजना सात वर्ष बाद भी पूरी नहीं हो सकी है। योजना का उद्देश्य 29 ग्रामों तक शुद्ध पेयजल पहुंचाना था, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि आज भी कई गांवों में नियमित जलापूर्ति शुरू नहीं हो पाई है। अधूरे निर्माण और कार्य में देरी के कारण करोड़ों रुपये की यह परियोजना सवालों के घेरे में है।
यह जानकारी देते हुए मनोज श्रीवास्तव ने बताया कि योजना का क्रियान्वयन मध्य प्रदेश जल निगम मर्यादित द्वारा कराया जा रहा है, जबकि निर्माण एजेंसी इंटर्जेन एनर्जी लिमिटेड, गुरुग्राम है। योजना के तहत निर्माण कार्य पूर्ण कर जलापूर्ति शुरू करने के बाद इसे संबंधित ग्राम पंचायतों को हस्तांतरित (हैंडओवर) किया जाना था, लेकिन यह प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हो सकी है।
ग्रामीणों के अनुसार, कई ग्राम पंचायतों में आज भी ओवरहेड टंकियों का निर्माण जारी है, कई स्थानों पर पाइपलाइन बिछाने का कार्य अधूरा है और अनेक गांवों में पेयजल की नियमित आपूर्ति शुरू नहीं हुई। ऐसे में ग्रामीणों को आज भी वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
लोंगो कि टूटी पाइप लाइन से बढ़ी चिंता ..!
हाल ही में ग्राम बल्हौड में नंदलाल केवट के घर के पास जलापूर्ति पाइपलाइन क्षतिग्रस्त हो गई थी। ग्रामीणों का आरोप है कि पाइप टूटने के बाद उसकी अस्थायी मरम्मत कर छोड़ दिया गया। इसके बाद कई घरों में दुर्गंधयुक्त एवं दूषित पानी पहुंचने की शिकायत सामने आई।
ग्रामीणों का यह भी दावा है कि मरम्मत के दौरान कंपनी के कर्मचारियों ने पाइपलाइन के भीतर बड़ी संख्या में मृत चूहे मिलने की बात कही थी।
जनस्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर मामला
यदि दूषित पानी की शिकायतें सही हैं, तो यह मामला केवल निर्माण कार्य में देरी तक सीमित नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य से भी जुड़ा है। ग्रामीणों ने जल गुणवत्ता की जांच, परियोजना का तकनीकी परीक्षण, अधूरे कार्यों को शीघ्र पूरा करने तथा जिम्मेदार अधिकारियों एवं निर्माण एजेंसी की जवाबदेही तय करने की मांग की है।
क्या है जल निगम का पक्ष ..?
परियोजना में हो रही देरी को लेकर जब मध्य प्रदेश जल निगम के डीवाईएम शुभम गुप्ता से जानकारी ली गई, तो उन्होंने बताया कि गर्मी के दौरान नदी में पानी की कमी के कारण इंटेकवेल में पर्याप्त जल उपलब्ध नहीं था। ऐसे में बाईपास व्यवस्था एवं मड पंप के माध्यम से जलापूर्ति का संचालन किया गया। उन्होंने कहा कि वर्तमान में 29 में से लगभग 20–22 गांवों में जलापूर्ति शुरू हो चुकी है तथा शेष 3–4 गांवों में भी जल्द सप्लाई शुरू कर दी जाएगी, क्योंकि अब इंटेकवेल में पर्याप्त पानी उपलब्ध है।
उन्होंने यह भी बताया कि परियोजना में लंबे समय तक वन विभाग की अनुमति (एनओसी) संबंधी बाधाएं रहीं, जिससे कार्य प्रभावित हुआ। अब अधिकांश स्थानों पर आवश्यक एनओसी प्राप्त हो चुकी है। श्री गुप्ता के अनुसार अभी ठेकेदार को ट्रायल रन नहीं दिया गया है। उनका कहना है कि वर्तमान में जो भी अनावश्यक विलंब हो रहा है, वह निर्माण एजेंसी की लापरवाही के कारण है और इस संबंध में विभाग द्वारा ठेकेदार पर नियमानुसार पेनल्टी लगाने की कार्रवाई की जाएगी।
अब जवाबदेही पर उठ रहे सवाल ..?
कहावत है—"देर आए, दुरुस्त आए", लेकिन यहां सात साल बाद भी न तो काम पूरा हुआ और न ही लोगों तक शुद्ध पानी पहुंचा। करोड़ों रुपये की परियोजना के बावजूद यदि ग्रामीण आज भी पेयजल के लिए परेशान हैं, तो यह संबंधित विभाग और निर्माण एजेंसी की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
अब देखना यह होगा कि मध्य प्रदेश जल निगम मर्यादित और इंटर्जेन एनर्जी लिमिटेड इस परियोजना को कब तक पूरी तरह पूर्ण करते हैं, निर्माण संबंधी कमियों एवं दूषित पानी की शिकायतों की जांच कब होती है और 29 गांवों के लोगों को सुरक्षित एवं नियमित पेयजल आखिर कब उपलब्ध हो पाता है।
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