उमरिया का चमड़ा कारखाना: एक भुला हुआ औद्योगिक अध्याय

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drms news (मानपुर उमरिया)। आज भले ही उमरिया कोयला नगरी के नाम से जाना जाता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि 20 वीं सदी की शुरुआत में ही उमरिया औद्योगिक नगरी बन चुकी थी।
इतिहास के पन्नों से . . . . .
उमरिया में चमड़ा कारखाने की स्थापना 1909 में रीवा स्टेट के स्वामित्व वाली इकाई के रूप में की गई थी। 1912 में अंग्रेजी सरकार से चमड़ा पकाने का कारखाना खरीदा गया और 1913-14 में कारखाना पूरी गति से चलने लगा। उस दौर में यह उद्योग उमरिया के प्रमुख औद्योगिक प्रतिष्ठानों में गिना जाता था।
कारखाने की विशेषताएं
इसकी क्षमता: प्रतिदिन 100 खालों (Hides) के प्रसंस्करण की क्षमता ऊर्जा: 65 किलोवाट संयंत्र से उत्पादन यह उत्पाद: राज्य की फौज के लिए जूते, घोड़े की जीन और चमड़े की अन्य वस्तुएं
यहां के बने जूते विदेश तक सप्लाई
इस कारखाने की गुणवत्ता इतनी अच्छी थी कि युद्ध के दौरान *बर्मा-रंगून की पुलिस के लिए जूतों की बड़ी मात्रा में आपूर्ति* के आदेश इसी कारखाने को मिले थे। इसके उत्पाद राज्य के भीतर ही नहीं, बल्कि राज्य के बाहर भी भेजे जाते थे।
लंबे समय तक पी. धन बहल कारखाने के मैनेजर रहे। यह कारखाना लगभग दो दशक तक सफलतापूर्वक संचालित हुआ और 1933 में पूरी तरह बंद हो गया। आज यह कारखाना अस्तित्व में नहीं है, लेकिन इसका उल्लेख यह प्रमाणित करता है कि बीसवीं सदी के आरम्भ में ही उमरिया चमड़ा उद्योग और औद्योगिक गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। सौजन्य से मनोज श्रीवास्तव, केशव विश्वकर्मा मानपुर
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