
drms news (शहडोल)। तस्वीर देखिए, ये किसी 100 साल पुरानी नहीं, आज की है। शहडोल दक्षिण वन मण्डल, वन परिक्षेत्र शहडोल के उप वन परिक्षेत्र बीट निपनिया के अहिर टोला की है। यहां के आदिवासी ग्रामीण आजादी के 82 साल बाद भी दलदल नुमा रास्ते में चलने को मजबूर हैं। बरसात में कभी भी गंभीर घटना घट सकती है।
आपको फोटो में दिखाई दे रहीं महिलाएं, बच्चे ईंटों से लदी ट्राली को कीचड़ से खींचते हुए दिख रहे हैं। यही इनका रोजाना मुख्य रास्ता है, जिससे आवागमन ग्रामीणों का होता है।
हजारों एकड़ जमीन पर हक का पुराना विवाद, इस दुर्दशा के पीछे एक बड़ा सरकारी विवाद भी है। मध्यप्रदेश सरकार और आदिवासी ग्रामीणों के बीच हजारों एकड़ भूमि पर हक को लेकर विवाद चल रहा है। इस पर मध्यप्रदेश सरकार के तत्कालीन मुख्य सचिव एंटोनी डिसा ने 1 जून 2015 को सभी जिला कलेक्टरों को पत्र लिखा था।
पत्र में उल्लेख था कि सन 1975 के पहले इस जमीन को गलत तरीके से अधिग्रहित कर जंगल की परिधि में ले लिया गया था। अब गलती सुधारते हुए निजी भू-खण्डों को वन भूमि से अलग किया जाए।
पेसा एक्ट लागू होने के बावजूद फिर भी जमीन पर कुछ नहीं
यही नहीं, 15 नवम्बर 2022 को तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शहडोल जिले के लालपुर में देश की महामहिम राष्ट्रपति की उपस्थिति में करोड़ों रुपये खर्च कर पूरे मध्यप्रदेश में पेसा एक्ट लागू करने की घोषणा की थी।
पेसा एक्ट के मुताबिक पारंपरिक सीमा में आने वाले जल, जंगल, जमीन पर उस ग्राम सभा का अधिकार होता है। लेकिन घोषणा के 4 साल बाद भी अहिर टोला के आदिवासियों को न सड़क मिली, न जमीन का हक। जनहित में सवाल यह है कि जब शासन के ही आदेश में जमीन निजी है, और पेसा एक्ट में ग्राम सभा का अधिकार है, तो फिर अहिर टोला के ग्रामीणों को दलदल से कब निजात मिलेगी ... ? सौजन्य से विश्नूप्रताप सिंह
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