संजय गांधी थर्मल पावर स्टेशन में दो कार्यों की निविदा प्रक्रिया सामने आने के बाद उठे सवाल, जलापूर्ति और बुनियादी सुविधाओं से पहले सौंदर्यीकरण की प्राथमिकता पर मांगा जवाब
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drms news (मानपुर उमरिया)। मानपुर विधानसभा अंतर्गत बिरसिंहपुर पाली स्थित संजय गांधी थर्मल पावर स्टेशन (एसजीटीपीएस) में प्रस्तावित दो कार्यों को लेकर सरकारी धन के उपयोग और कार्यों की प्राथमिकता पर सवाल उठने लगे हैं। सामने आए दस्तावेजों के अनुसार 10 अगस्त 2026 को दो अलग-अलग कार्यों के लिए निविदा पूछताछ प्रक्रिया सामने आई है, जिसकी अंतिम तिथि 20 अगस्त 2026 निर्धारित दिखाई दे रही है।
इनमें एक कार्य मुख्य कॉलोनी गेट के सौंदर्यीकरण से जुड़ा है, जिसमें हाथी, बाघ आदि की आकृतियां उपलब्ध कराने एवं स्थापित करने का उल्लेख है। वहीं दूसरा कार्य जलापूर्ति व्यवस्था से संबंधित अत्यावश्यक मरम्मत कार्य का है, जिसमें जलाशय क्षेत्र के समीप संरचनात्मक स्टील प्लेटफॉर्म आदि से जुड़े कार्य प्रस्तावित बताए गए हैं।
सौंदर्यीकरण जरूरी या पहले बुनियादी सुविधाएं ..?
सवाल यह नहीं है कि पावर प्लांट परिसर का सौंदर्यीकरण होना चाहिए या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि सरकारी धन खर्च करने की प्राथमिकता किस आधार पर तय की जा रही है ...?
संयंत्र एवं कॉलोनी क्षेत्र में सड़क, जलापूर्ति, सुरक्षा व्यवस्था तथा रहवासी क्षेत्रों में फैली बड़ी-बड़ी झाड़ियों और जंगलनुमा स्थिति जैसी मूलभूत समस्याओं पर लगातार ध्यान देने की आवश्यकता रहती है। ऐसे में मुख्य गेट के सौंदर्यीकरण पर प्रस्तावित खर्च को लेकर विभाग से स्पष्ट जानकारी सामने आना जरूरी है।
हाथी-बाघ की आकृतियों पर कितना खर्च .... ?
सौंदर्यीकरण कार्य को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल सामने हैं। यदि मुख्य गेट पर हाथी, बाघ अथवा अन्य आकृतियां स्थापित की जानी हैं तो— इनकी संख्या कितनी होगी ..?, आकृतियों का आकार और निर्माण सामग्री क्या होगी ..?, डिजाइन किस आधार पर तय किया गया है ...?, प्रति आकृति अनुमानित लागत कितनी है ...?, कुल स्वीकृत राशि कितनी है ....?, लागत का तकनीकी एवं वित्तीय औचित्य किस अधिकारी ने प्रमाणित किया है ...? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक किए जाने की मांग उठ रही है।
जलापूर्ति मरम्मत कार्य की वास्तविक स्थिति भी हो सार्वजनिक
दूसरा प्रस्तावित कार्य जलापूर्ति व्यवस्था से संबंधित है। इसे अत्यावश्यक मरम्मत कार्य बताया गया है। ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि जलापूर्ति व्यवस्था में वास्तविक समस्या क्या है, उसका तकनीकी परीक्षण किस स्तर पर हुआ और मरम्मत की अनुमानित लागत किस आधार पर तय की गई। यदि जलापूर्ति से जुड़ी व्यवस्था वास्तव में अत्यावश्यक मरम्मत मांग रही है तो उसका समयबद्ध और गुणवत्तापूर्ण निष्पादन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
निविदा से लेकर भुगतान तक पारदर्शिता की मांग
मामला केवल प्रस्तावित खर्च तक सीमित नहीं है। कार्य की आवश्यकता, तकनीकी स्वीकृति, अनुमानित लागत, कार्य की मात्रा, दर निर्धारण, निविदा प्रक्रिया और चयनित एजेंसी सहित पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होना आवश्यक है।
साथ ही कार्य पूर्ण होने के बाद उसकी गुणवत्ता का स्वतंत्र तकनीकी परीक्षण कराया जाना चाहिए, ताकि सरकारी राशि खर्च होने के बाद उसकी उपयोगिता और गुणवत्ता पर कोई सवाल न उठे।
‘सरकारी धन है, हिसाब भी सार्वजनिक होना चाहिए’
दस्तावेज सामने आने के बाद अब मांग उठ रही है कि संबंधित विभाग दोनों कार्यों से जुड़ी प्रशासकीय स्वीकृति, तकनीकी स्वीकृति, अनुमानित लागत, निविदा शर्तें, कार्य की मात्रा और चयनित एजेंसी से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करे। सरकारी धन के उपयोग पर सवाल उठाना विकास विरोध नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन के प्रति जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग है।
यदि दोनों कार्य नियमों के तहत आवश्यक और वित्तीय रूप से उचित हैं तो विभाग के पास उनके औचित्य से जुड़े दस्तावेज मौजूद होंगे। वहीं यदि जांच में किसी स्तर पर अनावश्यक कार्य, लागत में अनियमितता अथवा नियमों की अनदेखी सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होना आवश्यक है। अब निगाहें संबंधित विभाग पर हैं कि वह इन दोनों प्रस्तावित कार्यों की लागत और आवश्यकता को लेकर उठ रहे सवालों पर कितनी पारदर्शिता से जवाब देता है।सौजन्य से मनोज श्रीवास्तव, केशव विश्वकर्मा
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